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एबीवीपी: व्यक्ति निर्माण से राष्ट्र निर्माण

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राष्ट्रभक्ति ले हृदय में, हो खडा यदि देश सारा। संकटों पर मात कर यह राष्ट्र विजयी हो हमारा।। ये पंक्तियां   'अखिल भारतीय  विद्यार्थी  परिषद्'   ( ABVP) जैसे दूरदर्शी, समदर्शी, सर्वसमावेशी संगठन का ध्येय मंत्र है। तभी तो ऐसे गीतों को गाकर परिषद् के कार्यकर्ताओं का सीना चौड़ा, भुजाएं फौलादी और आत्मविश्वास दुगुना हो जाता है। तब एक सामान्य सा छात्र एक ऐसा व्यक्ति बन जाता है, जो कुछ भी कर गुजरने की इच्छा रखता है। उसमें इतना जोश रहता है कि वह किसी भी चुनौती को स्वीकारने के लिए  तैयार रहता है। व्यक्ति निर्माण से राष्ट्रनिर्माण के इस मन्त्र ने हजारों छात्र-युवाओं को दिशा दी है। इसलिए आज समाज ने स्वीकार किया है कि छात्र शक्ति ही राष्ट्रशक्ति है।   स्वतंत्रता आन्दोलन में छात्रों की प्रमुख भूमिका रही है, इस बात से कोई इंकार नहीं कर सकता। महात्मा गांधी के आह्वान पर लाखों छात्र अंग्रेजी सरकार द्वारा स्थापित स्कूलों, कॉलेजों और विश्वविद्यालयों को छोडकर आजादी के आंदोलन में कूद पडें थे। उस समय अंग्रेजी सरकार ने छात्रों को उनके कैरियर की दुहाई दी। लेकिन...

युगदृष्टा स्वामी विवेकानंद की पथगामी मनोहर सरकार

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''आज   अपने देश को आवश्यकता है ,  लोहे के समान मांसपेशियों और वज्र के समान   स्नायुओं की। हम बहुत दिनों तक रो चुके ,  अब रोने की आवश्यकता नहीं। अब   अपने पैरों पर खड़े हो जाओ और मनुष्य बनो''।   आज से ठीक  121  वर्ष   पूर्व मद्रास के युवाओं के सम्मुख दिए व्याख्यान में स्वामी विवेकानंद ने   यह विश्वास व्यक्त किया था। स्वामी जी ने अपने जीवन ,  प्रेरणा ,  विचार ,  साहित्य तथा कर्तव्य से तरुणाई को परिभाषित व प्रेरित किया। उन्होंने  39  वर्ष  5  माह व  22  दिन की अल्पायु में ऐसा पराक्रम किया कि सारा विश्व   स्तब्ध  रह गया। यह स्वामी विवेकानन्द के सजीव संदेश का ही प्रभाव है जिसके   कारण उनके प्रत्यक्ष या परोक्ष सम्पर्क में आए लोगों का जीवन बदल गया।   हरियाणा के मुख्यमंत्री मनोहर लाल की कार्यशैली से यह अंदाजा लगाया जा सकता   है कि वे भी स्वामी विवेकानंद के पथगामी है। जो प्रदेश की दुर्दशा पर रोने-पीटने और दूसरे पर दोष देने की बजाय खुद प्रदेश को स्वाबलंबी बना   रहे ह...

आखिर कब मिलेगी ''केरल'' को आजादी

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शनिवार रात एकबार फिर केरल की घरती लहुलुहान हुई। केरल के कोयिलांदी जिले के किझैयूर गांव में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के कार्यकर्ताओं को माक्र्सवादी कम्युनिष्ट पार्टी (सीपीएम) कार्यकर्ताओ ने निशाना बनाया। उन पर बम फेंक कर जान से मारने की कोशिश हुई। इस हमले में संघ के तीन कार्यकर्ता घायल हुए हैं। तीन दिन पहले (5 मार्च) भी संघ के कार्यालय पर देसी बम से हमला किया गया था। इसमें चार कार्यकर्ता घायल हुए थे। लेकिन, केरल की वामपंथी सरकार इन घटनाओं पर चुप्पी साधे हुए है। जबकि इसी विचारधारा से प्रेरित छात्र कभी कश्मीर, कभी बस्तर, कभी जेएनयू तो कभी डीयू में आजादी की मांग करते है। मुझे समझ में नहीं आ रहा है कि वामपंथी छात्र व उनके आका किस आजादी की बात कर रहे है। ये आजादी ही तो है कि वे भारत माता तेरे टुकड़े होंगे जैसे देशद्रोही नारे लगा लेते है। ऐसा कृत्य किसी दूसरे देश में करते तो क्या हालत होता, ये वे जानते है।  और यदि वामपंथियों को आजादी के सही अर्थ पता है तो क्या वे बता सकते है कि केरल को आजादी कब मिलेगी? क्या केरल में भारत माता की जय, वंदे मातरम् के नारे लगाना अपराध है? यदि नही...

नया नहीं है राष्ट्रद्रोह का यह खेल

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मुकेश शर्मा, दिल्ली विश्वविद्यालय में जारी राष्ट्रवाद बनाम राष्ट्रद्रोह में अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद्(एबीवीपी) ने सिद्ध कर दिया कि वह कैंपस में देशद्रोही नारों को बर्दाश्त नहीं करेगी। यह सही भी है। क्योंकि अभिव्यक्ति के नाम पर देश के खिलाफ कुछ भी कहने की इजाजत नहीं होनी चाहिए।  मेरा मानना है कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता एक स्वस्थ लोकतंत्र के लिए जरूरी भी है। लेकिन संसद पर हुए आतंकी हमले के दोषी अफजल गुरु की बरसी मनाकर उसे शहीद बताना और भारत विरोधी नारे लगे जैसी हरकतों को देश हित में नहीं कहा जा सकता है। 2014 में आई राष्ट्रवादी भाजपा सरकार के बाद इन सपोलों का दम घुटने लगा है। इसलिए छटपटाते हुए ये इधर-उधर हाथ-पैर मारकर अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहे है। इससे पहले भी ये पथभ्रष्ट छात्र कई बार देश विरोधी गतिविरोधी गतिविधियों में पैरवी करते नजर आए।  चाहे फिदायीन इशरत जहां का मामला हो या संसद हमले के जिम्मेदार अफजल गुरू का मामला हो या मुंबई हमलों के लिए जिम्मेदार याकूब मेमन की फांसी का सवाल हो। मुझे समझ नहीं आता कि जब कभी चीन की फौज विवादित क्षेत्र से भारत में घुस ...

कितनी डरावनी थी 19 जनवरी की वो रात

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-कट्टरपंथियों के जुल्म से तंग आकर शुरू हुआ था विस्थापन -अपने देश में विस्थापितों की जिंदगी जी रहे है पंडित मुकेश शर्मा,  फरीदाबाद। 19 जनवरी, इतिहास के पन्नों में यह तारीख घाटी से कश्मीरी पंडितों के पलायन के दिन के रूप में दर्ज है। 90 के दशक आज ही के दिन ठीक 27 साल पहले कश्मीर से पंडितों का विस्थापन शुरू हुआ था। जेहादी कट्टरपंथियों के जुल्म ने उन्हें घर छोडऩे को मजबूर कर दिया। 27 साल पहले की उस डरावनी रात को सोचकर आज भी कश्मीर पंडित सिरह उठते है।  वर्ष 1985 के बाद से कश्मीर पंडितों को कट्टरपंथियों और आतंकवादियों से लगातार धमकियां मिलने लगी। आखिरकार 19 जनवरी 1990 को कट्टरपंथियों ने 4 लाख कश्मीरी पंडितों को उनके घरों से भागने के लिए मजबूर कर दिया। कश्मीर से भागे सैंकड़ों पंडितों ने फरीदाबाद में शहर ली। सेक्टर दो, तीन, 55, 37, 14, 15 में ऐसे 12 सौ से ज्यादा परिवार है, जो आज भी 1990 के मंजर को याद कर सिहर उठते है। सौपोर कस्बे में स्टेश्नरी और सेबों के थोक विक्रेता रहे पंडिता परिवार अब एक कमरे का मकान रहते है। जबकि कस्बे में उनका 30 एकड़ जमीन में सेब के बागान थे, चार म...

भारतीय सर्जिकल स्ट्राइक बनाम अमेरिकी सर्जिकल स्ट्राइक्स

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भारत में शहीदों की कीमत क्या होती है? ये पिछले दिनों मोदी ने दुनिया को बता दिया है। दुश्मन के घर में घुसकर, दुश्मन की जमीन पर सेना ने आतंकियों के साथ-साथ पाकिस्तान की अकड़ को भी नेस्तनाबूद कर दिया। भारतीय सेना के सीमापार पीओके में सर्जिकल ऑपरेशन के बाद सर्जिकल ऑपरेशन को लेकर दुनिया भर की नजर भारत पर टिक गई है। सर्जिकल स्ट्राइक के लिए दक्ष अमेरिका, इजराइल भी भारतीय सर्जिकल स्ट्राइक के कायल हो गए है। आज हम आपको बताते हैं दुनिया के 5 मशहूर सर्जिकल स्ट्राइक्स या सर्जिकल ऑपरेशन के बारे में जिन्हें अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा मिली और इतिहास के पन्नों में दर्ज हो गए।  भारतीय सेना का म्यांमार में सर्जिकल ऑपरेशन जून 2015 में 70 इंडियन आर्मी के सैनिकों की टीम ने म्यांमार के जंगलों में सर्जिकल ऑपरेशन किया और इस 40 मिनट के ऑपरेशन में 38 नागा उग्रवादियों को मौत के घाट उतार दिया और 7 उग्रवादी गंभीर रूप से घायल हुए। ये कार्रवाई भारत के चंदेल एरिया में 18 भारतीय सैनिकों के मारने के जवाब में की गई थी जिन्हें 4 जून 2015 को नागा उग्रवादियों ने मारा था।  ओसामा बिन लादेन की हत्या मई 2011 म...

कुछ तो सीखो जापान से

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आज विभिन्न ट्रेड यूनियनों की राष्ट्रव्यापी हड़ताल थी। हर विभाग, कार्यालय में मोदी सरकार के खिलाफ जमकर नारेबाजी हुई। आम लोगों के रोजमर्रा के काम नहीं हो पाए। सुनकर आश्चर्य होगा एक दिन की हड़ताल ने देश को 26000 करोड़ रुपए का आर्थिक नुकसान किया। अब हमारे कर्मचारी नेताओं को अब अपना ट्रेड बदल लेना चाहिए। उदाहरण जापान हो सकता है। यहां हड़ताल या बंदी के दौरान विरोध करने का एक अलग तरीका है। जब वहाँ के जूता फैक्ट्री के लोगों ने हड़ताल शुरू होती है तो वे काम नहीं रोकते। बल्कि उसे और बढ़ा देते है। उन्हें मालूम है कि आज या कल उनकी बात तो सुनी जाएगी ही। वे लोग एक ही पैर के जूते का उत्पादन शुरू कर देते है। जिससे कंपनी के स्टॉक में एक ही पैर के जूतों का स्टॉक काफी बढ़ गया , जिससे कंपनी प्रबंधन को उनकी मांगें माननी पड़ती है। अब जब हड़ताल खत्म हो गई तो दूसरे पैर का जूता बनाने लगते है। इससे न तो काम का नुकसान होता है, न ही श्रम का और न ही कंपनी का। हड़ताल के इस तरीके को यदि हम अपने देश में लागू करें तो निश्चित ही हड़ताल के दुष्प्रभाव को कम किया जा सकता है।