Posts

कांट्रैक्ट फार्मिंग कानून होता, तो नहीं बंद होता टमाटर पेस्ट प्लांट

किसानों के नाम पर जारी आंदोलन में शामिल तमाम किसान संगठनों और राजनीतिक दलों को एकबार पंजाब के गांव जहूरा की इस कहानी और घटनाक्रम को जरूर पढना और समझना चाहिए। राष्ट्रीय राजमार्ग-44 पर होशियारपुर व जालंधर जिलों की सीमा पर स्थित है गांव जहूरा। वैसे तो यह गांव पंजाब के 13 हजार अन्य गांवों जैसा ही है, पर आज जब पूरे देश में केंद्र सरकार द्वारा बनाए गए कृषि कानूनों पर चर्चा छिड़ी है तो ऐसे में इस गांव का जिक्र अत्यंत जरूरी और सामयिक है। यह देशभर में एकमात्र वह गांव है, जहां पेप्सिको जैसी मल्टीनेशनल कंपनी ने भारत प्रवेश की आज्ञा के बाद टमाटर से पेस्ट बनाने वाला देश का सबसे पहला प्रोसेसिंग प्लांट स्थापित किया था। इस प्लांट के शुरू होने से लेकर अब तक के सफर की कहानी में सिमटा है इन नए कृषि कानूनों की अहमियत और जरूरत का वह सार जिसे आज विपक्षी दलों समेत तमाम किसान संगठन पूरी तरह नजरअंदाज कर विरोध में खड़े हैं। वर्ष 1989 में प्लांट लगते ही यहां के हजारों किसानों ने कंपनी के साथ किए अनुबंध के तहत उसके द्वारा दी गई टमाटर की उन्नत किस्मों के बीजों का प्रयोग किया। बाजार में कीमत कंपनी अनुबंध के तहत तय ...

जानकारी की कमी, कृषि कानूनों पर आंदोलन

किसानों के हितों में तीन बिल (विधेयक) पारित होने के साथ ही कृषि सुधार की पहल एक राजनीतिक मुद्दा बन गई है। बीते आठ दिन से किसान आंदोलन के नाम पर कुछ राजनीतिक दल और संगठन किसानों को भड़काकर राजनीतिक रोटियां सेंक रहे है। परिणामस्वरूप कई राज्यों में किसान सड़क पर उतर चुके हैं। कृषि सुधार वास्तव में हैं क्या और उनसे नफा है या नुकसान, यह बात पीछे छोड़ हर सियासी दल आगामी विधानसभा चुनावों के लिए इस मुद्दे को अवसर मानते हुए किसानों के आंदोलन की आग में घी डालने पर उतर आया है। नतीजन पंजाब से लेकर महाराष्ट्र तक कई दल इसका विरोध कर रहे हैं। इन विधेयकों के विरोध में शिरोमणि अकाली दल की हरसिमरत कौर बादल ने केंद्रीय मंत्री पद से इस्तीफा तक दे दिया है। निहित स्वार्थ-प्रेरित आढ़तिया लॉबी द्वारा भड़काए गए किसानों के सड़क पर उतर आने के बाद अब कुछ राजनीतिक दलों में इन विधेयकों का विरोध करते हुए किसान हितैषी दिखने की होड़ मच गई है। दरअसल यह आढ़तिया लॉबी द्वारा प्रायोजित और वोट बैंक की राजनीति से प्रेरित विरोध है। ऐसे में यह जानना बेहद जरुरी है कि इन विधेयकों में क्या खास है और क्यों इनका विरोध हो रहा है। क्...

लोकसभा चुनाव 2019: इन 10 वजहों से हरियाणा की सभी सीटों पर जीतेगी BJP

चुनाव आयोग ने लोकसभा चुनाव 2019 की तारीखों का ऐलान कर चुका है। ऐसे में सभी पार्टियों ने चुनाव प्रचार में अपनी पूरी ताकत झोंकने की तैयारी शुरू कर दी है। पिछले लोकसभा चुनाव—2014 में हरियाणा की 10 लोकसभा सीट में से 7 सीटें बीजेपी, दो इनेलो और एक सीट पर कांग्रेस पार्टी की झोली में गई। विधानसभा चुनाव में प्रदेश में पहली बार भारतीय जनता पार्टी को स्पष्ट बहुमत मिला और भाजपा पार्टी की सरकार बनी। इसलिए तय है कि लोकसभा चुनाव 2019 पर प्रदेश सरकार के कार्यों का असर भी पडेगा। पांच नगर निगम और जींद उपचुनाव जीतकर पार्टी उत्साहित है। मोदी व मनोहर सरकार के विकास कार्यों के बल पर पार्टी सभी 10 सीटों पर जीत का दावा कर रही है। आईये, इन वजहों को जानते है:— 1. ईमानदार मुख्यमंत्री ने किया कायल लोकसभा चुनाव 2019 में इसबार मोदी—मनोहर की जोडी लोगों को खूब भा रही है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ लोग मुख्यमंत्री मनोहरलाल की ईमानदारी कार्यशैली से खासे प्रभावित है।  क्योंकि प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्रियों पर लगातार भ्रष्टाचार के आरोप लगते रहे। जेबीटी टीचर घोटाले में जहां पूर्व मुख्यमंत्री...

एबीवीपी: व्यक्ति निर्माण से राष्ट्र निर्माण

Image
राष्ट्रभक्ति ले हृदय में, हो खडा यदि देश सारा। संकटों पर मात कर यह राष्ट्र विजयी हो हमारा।। ये पंक्तियां   'अखिल भारतीय  विद्यार्थी  परिषद्'   ( ABVP) जैसे दूरदर्शी, समदर्शी, सर्वसमावेशी संगठन का ध्येय मंत्र है। तभी तो ऐसे गीतों को गाकर परिषद् के कार्यकर्ताओं का सीना चौड़ा, भुजाएं फौलादी और आत्मविश्वास दुगुना हो जाता है। तब एक सामान्य सा छात्र एक ऐसा व्यक्ति बन जाता है, जो कुछ भी कर गुजरने की इच्छा रखता है। उसमें इतना जोश रहता है कि वह किसी भी चुनौती को स्वीकारने के लिए  तैयार रहता है। व्यक्ति निर्माण से राष्ट्रनिर्माण के इस मन्त्र ने हजारों छात्र-युवाओं को दिशा दी है। इसलिए आज समाज ने स्वीकार किया है कि छात्र शक्ति ही राष्ट्रशक्ति है।   स्वतंत्रता आन्दोलन में छात्रों की प्रमुख भूमिका रही है, इस बात से कोई इंकार नहीं कर सकता। महात्मा गांधी के आह्वान पर लाखों छात्र अंग्रेजी सरकार द्वारा स्थापित स्कूलों, कॉलेजों और विश्वविद्यालयों को छोडकर आजादी के आंदोलन में कूद पडें थे। उस समय अंग्रेजी सरकार ने छात्रों को उनके कैरियर की दुहाई दी। लेकिन...

युगदृष्टा स्वामी विवेकानंद की पथगामी मनोहर सरकार

Image
''आज   अपने देश को आवश्यकता है ,  लोहे के समान मांसपेशियों और वज्र के समान   स्नायुओं की। हम बहुत दिनों तक रो चुके ,  अब रोने की आवश्यकता नहीं। अब   अपने पैरों पर खड़े हो जाओ और मनुष्य बनो''।   आज से ठीक  121  वर्ष   पूर्व मद्रास के युवाओं के सम्मुख दिए व्याख्यान में स्वामी विवेकानंद ने   यह विश्वास व्यक्त किया था। स्वामी जी ने अपने जीवन ,  प्रेरणा ,  विचार ,  साहित्य तथा कर्तव्य से तरुणाई को परिभाषित व प्रेरित किया। उन्होंने  39  वर्ष  5  माह व  22  दिन की अल्पायु में ऐसा पराक्रम किया कि सारा विश्व   स्तब्ध  रह गया। यह स्वामी विवेकानन्द के सजीव संदेश का ही प्रभाव है जिसके   कारण उनके प्रत्यक्ष या परोक्ष सम्पर्क में आए लोगों का जीवन बदल गया।   हरियाणा के मुख्यमंत्री मनोहर लाल की कार्यशैली से यह अंदाजा लगाया जा सकता   है कि वे भी स्वामी विवेकानंद के पथगामी है। जो प्रदेश की दुर्दशा पर रोने-पीटने और दूसरे पर दोष देने की बजाय खुद प्रदेश को स्वाबलंबी बना   रहे ह...

आखिर कब मिलेगी ''केरल'' को आजादी

Image
शनिवार रात एकबार फिर केरल की घरती लहुलुहान हुई। केरल के कोयिलांदी जिले के किझैयूर गांव में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के कार्यकर्ताओं को माक्र्सवादी कम्युनिष्ट पार्टी (सीपीएम) कार्यकर्ताओ ने निशाना बनाया। उन पर बम फेंक कर जान से मारने की कोशिश हुई। इस हमले में संघ के तीन कार्यकर्ता घायल हुए हैं। तीन दिन पहले (5 मार्च) भी संघ के कार्यालय पर देसी बम से हमला किया गया था। इसमें चार कार्यकर्ता घायल हुए थे। लेकिन, केरल की वामपंथी सरकार इन घटनाओं पर चुप्पी साधे हुए है। जबकि इसी विचारधारा से प्रेरित छात्र कभी कश्मीर, कभी बस्तर, कभी जेएनयू तो कभी डीयू में आजादी की मांग करते है। मुझे समझ में नहीं आ रहा है कि वामपंथी छात्र व उनके आका किस आजादी की बात कर रहे है। ये आजादी ही तो है कि वे भारत माता तेरे टुकड़े होंगे जैसे देशद्रोही नारे लगा लेते है। ऐसा कृत्य किसी दूसरे देश में करते तो क्या हालत होता, ये वे जानते है।  और यदि वामपंथियों को आजादी के सही अर्थ पता है तो क्या वे बता सकते है कि केरल को आजादी कब मिलेगी? क्या केरल में भारत माता की जय, वंदे मातरम् के नारे लगाना अपराध है? यदि नही...

नया नहीं है राष्ट्रद्रोह का यह खेल

Image
मुकेश शर्मा, दिल्ली विश्वविद्यालय में जारी राष्ट्रवाद बनाम राष्ट्रद्रोह में अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद्(एबीवीपी) ने सिद्ध कर दिया कि वह कैंपस में देशद्रोही नारों को बर्दाश्त नहीं करेगी। यह सही भी है। क्योंकि अभिव्यक्ति के नाम पर देश के खिलाफ कुछ भी कहने की इजाजत नहीं होनी चाहिए।  मेरा मानना है कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता एक स्वस्थ लोकतंत्र के लिए जरूरी भी है। लेकिन संसद पर हुए आतंकी हमले के दोषी अफजल गुरु की बरसी मनाकर उसे शहीद बताना और भारत विरोधी नारे लगे जैसी हरकतों को देश हित में नहीं कहा जा सकता है। 2014 में आई राष्ट्रवादी भाजपा सरकार के बाद इन सपोलों का दम घुटने लगा है। इसलिए छटपटाते हुए ये इधर-उधर हाथ-पैर मारकर अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहे है। इससे पहले भी ये पथभ्रष्ट छात्र कई बार देश विरोधी गतिविरोधी गतिविधियों में पैरवी करते नजर आए।  चाहे फिदायीन इशरत जहां का मामला हो या संसद हमले के जिम्मेदार अफजल गुरू का मामला हो या मुंबई हमलों के लिए जिम्मेदार याकूब मेमन की फांसी का सवाल हो। मुझे समझ नहीं आता कि जब कभी चीन की फौज विवादित क्षेत्र से भारत में घुस ...

कितनी डरावनी थी 19 जनवरी की वो रात

Image
-कट्टरपंथियों के जुल्म से तंग आकर शुरू हुआ था विस्थापन -अपने देश में विस्थापितों की जिंदगी जी रहे है पंडित मुकेश शर्मा,  फरीदाबाद। 19 जनवरी, इतिहास के पन्नों में यह तारीख घाटी से कश्मीरी पंडितों के पलायन के दिन के रूप में दर्ज है। 90 के दशक आज ही के दिन ठीक 27 साल पहले कश्मीर से पंडितों का विस्थापन शुरू हुआ था। जेहादी कट्टरपंथियों के जुल्म ने उन्हें घर छोडऩे को मजबूर कर दिया। 27 साल पहले की उस डरावनी रात को सोचकर आज भी कश्मीर पंडित सिरह उठते है।  वर्ष 1985 के बाद से कश्मीर पंडितों को कट्टरपंथियों और आतंकवादियों से लगातार धमकियां मिलने लगी। आखिरकार 19 जनवरी 1990 को कट्टरपंथियों ने 4 लाख कश्मीरी पंडितों को उनके घरों से भागने के लिए मजबूर कर दिया। कश्मीर से भागे सैंकड़ों पंडितों ने फरीदाबाद में शहर ली। सेक्टर दो, तीन, 55, 37, 14, 15 में ऐसे 12 सौ से ज्यादा परिवार है, जो आज भी 1990 के मंजर को याद कर सिहर उठते है। सौपोर कस्बे में स्टेश्नरी और सेबों के थोक विक्रेता रहे पंडिता परिवार अब एक कमरे का मकान रहते है। जबकि कस्बे में उनका 30 एकड़ जमीन में सेब के बागान थे, चार म...

भारतीय सर्जिकल स्ट्राइक बनाम अमेरिकी सर्जिकल स्ट्राइक्स

Image
भारत में शहीदों की कीमत क्या होती है? ये पिछले दिनों मोदी ने दुनिया को बता दिया है। दुश्मन के घर में घुसकर, दुश्मन की जमीन पर सेना ने आतंकियों के साथ-साथ पाकिस्तान की अकड़ को भी नेस्तनाबूद कर दिया। भारतीय सेना के सीमापार पीओके में सर्जिकल ऑपरेशन के बाद सर्जिकल ऑपरेशन को लेकर दुनिया भर की नजर भारत पर टिक गई है। सर्जिकल स्ट्राइक के लिए दक्ष अमेरिका, इजराइल भी भारतीय सर्जिकल स्ट्राइक के कायल हो गए है। आज हम आपको बताते हैं दुनिया के 5 मशहूर सर्जिकल स्ट्राइक्स या सर्जिकल ऑपरेशन के बारे में जिन्हें अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा मिली और इतिहास के पन्नों में दर्ज हो गए।  भारतीय सेना का म्यांमार में सर्जिकल ऑपरेशन जून 2015 में 70 इंडियन आर्मी के सैनिकों की टीम ने म्यांमार के जंगलों में सर्जिकल ऑपरेशन किया और इस 40 मिनट के ऑपरेशन में 38 नागा उग्रवादियों को मौत के घाट उतार दिया और 7 उग्रवादी गंभीर रूप से घायल हुए। ये कार्रवाई भारत के चंदेल एरिया में 18 भारतीय सैनिकों के मारने के जवाब में की गई थी जिन्हें 4 जून 2015 को नागा उग्रवादियों ने मारा था।  ओसामा बिन लादेन की हत्या मई 2011 म...

कुछ तो सीखो जापान से

Image
आज विभिन्न ट्रेड यूनियनों की राष्ट्रव्यापी हड़ताल थी। हर विभाग, कार्यालय में मोदी सरकार के खिलाफ जमकर नारेबाजी हुई। आम लोगों के रोजमर्रा के काम नहीं हो पाए। सुनकर आश्चर्य होगा एक दिन की हड़ताल ने देश को 26000 करोड़ रुपए का आर्थिक नुकसान किया। अब हमारे कर्मचारी नेताओं को अब अपना ट्रेड बदल लेना चाहिए। उदाहरण जापान हो सकता है। यहां हड़ताल या बंदी के दौरान विरोध करने का एक अलग तरीका है। जब वहाँ के जूता फैक्ट्री के लोगों ने हड़ताल शुरू होती है तो वे काम नहीं रोकते। बल्कि उसे और बढ़ा देते है। उन्हें मालूम है कि आज या कल उनकी बात तो सुनी जाएगी ही। वे लोग एक ही पैर के जूते का उत्पादन शुरू कर देते है। जिससे कंपनी के स्टॉक में एक ही पैर के जूतों का स्टॉक काफी बढ़ गया , जिससे कंपनी प्रबंधन को उनकी मांगें माननी पड़ती है। अब जब हड़ताल खत्म हो गई तो दूसरे पैर का जूता बनाने लगते है। इससे न तो काम का नुकसान होता है, न ही श्रम का और न ही कंपनी का। हड़ताल के इस तरीके को यदि हम अपने देश में लागू करें तो निश्चित ही हड़ताल के दुष्प्रभाव को कम किया जा सकता है। 

फरीदाबाद में क्यों जरूरी है यूनिवर्सिटी

Image
पिछले तीन-चार साल से हम फरीदाबाद में कभी रीजनल सेंटर तो कभी विश्वविद्यालय की मांग को लेकर आंदोलन होते देख रहे है। विभिन्न छात्र संगठन अपनी क्षमता मुताबिक आवाज बुलंद कर रहे है। मेरा खुद भी मानना है कि फरीदाबाद को एक सरकारी विश्वविद्यालय की जरूरत है। शहर के युवाओं में गुणवत्ता शिक्षा के लिए विश्वविद्यालय की जरूरत और बढ़ जाती है। पिछले चार साल के दौरान एमडीयू का जिस तरह की कार्यशैली सामने आई है। उससे प्रतीत होता है कि यूनिवर्सिटी फरीदाबाद के छात्रों के भविष्य के साथ खिलवाड़ कर रही है। कई प्रश्र है, जिनके आधार पर छात्र समुदाय विश्वविद्यालय की मांग को और तेज कर सकता है।  -जब हिसार में तीन, रोहतक में दो, भिवानी, जींद, सोनीपत, सिरसा, कुरूक्षेत्र में यूनिवर्सिटी हो सकती है। तो फरीदाबाद यूनिवर्सिटी से महरूम क्यों?  -इन सब जिलों में औसतन दूरी 60 किलोमीटर है। जबकि फरीदाबाद से रोहतक की दूरी 120 किलोमीटर है। इसके बावजूद यहां विश्वविद्यालय नहीं? -छोटे-छोटे काम के लिए छात्र को रोहतक जाना पड़ता है, जिससे छात्र का आर्थिक शोषण के साथ मानसिक शोषण भी होता है।  -फरीदाबाद गुडग़ांव के बाद...

अटाली में कमजोर हुई विश्वास की डोर

Image
रक्षाबंधन पर न रिश्तेदार आए और न ही हुआ दंगल शांति के हो रहे प्रयास किसी को नहीं हो रहा विश्वास बल्लभगढ़। अटाली गांव में हुए दंगे को तीन माह से ज्यादा हो चला है। रक्षाबंधन के दिर इस बार पहले की तरह गांव में न ज्यादा रिश्तेदार आए और न ही वर्षों पुराना दंगल हुआ। दंगल जो लोगों को भाईचारे का ऐहसास कराता था, आज की तारीख में वह सभी को डरावना लगा। लोग अपने अनुभव बताते हैं कि पहले गांव में दूर-दूर से रिश्तेदार दंगल देखने आते थे। कई दिन गांव में रुकते थे, हंसी-अठखेलियां होती थीं। लेकिन अब गांव में दहशत का वातावरण है। इस आशंका से रिश्तेदारों ने भी अपनी चाल बदल ली कि कहीं वह भी दंगे की चपेट में न आ जाएं। दरसअल, 25 मई को एक धार्मिक स्थल निर्माण को लेकर दो समुदाय के बीच अविश्वास की गांठों को ढीली करने या खोलने के लिए ईमानदार कोशिश दिखाई नहीं दे रही। जिन लोगों ने इन गांठों को खोलने का प्रयास भी किए, उनकी आवाज नक्कारखाने में तूती की आवाज बन गई। कई गांवों के अमन पसंद लोगों ने शांति कमेटी बनाई। लेकिन हैरत करनी वाली बात है कि कमेटी पर भी अब लोगों का विश्वास नहीं है। दो दिन पहले गांव में जब...

संघर्ष विराम उल्लंघन और पाकिस्तान के आंतरिक समीकरण

केंद्ग में नई मोदी सरकार के शपथ ग्रहण समारोह में पाकिस्तान प्रधानमंत्री नवाज शरीफ की शिरकत से जो उम्मीद बंधी थी, वह अच्छे संकेत का सूचक बनी। लगा कि दशकों से चली आ रही भारत-पाकिस्तान के बीच शांति बहाली की प्रक्रिया में तेजी होगी। लेकिन एकबार फिर सीमा पर संघर्ष विराम उल्लंघन ने दोनों देशों की सीमा पर तल्खी बढ़ गई है। अपनी राष्ट्रीय पहचान बनाने में नाकाम पाकिस्तान इस समय बुरी तरह डरा हुआ है। लगातार गोलाबारी इसी असफलता का परिणाम व सूचक है। जहां इस तरह की घटनाओं के माध्यम से भारत में बनी नई केंद्ग सरकार को परखा जा रहा है। वहीं, पाकिस्तान के प्रधानमंत्री नवाज शरीफ को भी कमजोर किया जा रहा है ताकि भारत के साथ किसी तरह की मैत्री अथवा घनिष्ठता की संभावना को खत्म किया जा सके। हालांकि पाकिस्तान द्बारा संघर्ष विराम के उल्लंघन से बाज नहीं आ रहे पाकिस्तान पर अब मोदी सरकार आरपार के मूड में दिख रही है। इस मुद्दे पर न सिर्फ रक्षा व गृह मंत्री ने कड़ा रुख अपनाया है बल्कि प्रधानमंत्री भी चुनावी सभाओं में पाकिस्तान को कड़ी नसीहत दे रहे हैं।  दरअसल, आइएसआइ के कब्जे में पाक सेना द्बारा छेड़ा...

हरियाणा में बढ़ता जातीय विद्बेष

Image
सरकार की शह में शिकार हो रहा है दलित समाज हरियाणा प्रदेश का नाम कुछ साल पहले जहां दूध-दही के लिए जाना जाता था। वहीं, नाम इन दिनों महिला व दलित उत्पीड़न में शुमार हो रहा है। पिछले एक दशक में प्रदेश दलित और स्त्री उत्पीड़न की घटनाओं में बेतहाशा वृद्धि हुई है। पिछले महीने में ही हरियाणा राज्य में महिलाओं के साथ बलात्कार की लगातार 18 घटनाएं हुईं, जिनमें 16 दलित महिलाएं थी। जब से हरियाणा में कांग्रेस पार्टी की सरकार सत्तानसीन हुई, बलात्कार और दलित उत्पीड़न की घटनाएं आम बात हो गई है। गोहाना, मिर्चपुर, झज्जर की घटनाओं के बाद पिछले 25 मार्च को हिसार जिले के भगाणा गाँव की चार दलित लड़कियों के साथ सामूहिक बलात्कार की दिल दहला देने वाली घटना घटी। जिसके इंसाफ के लिए दो माह बाद भी लोग न्याय के लिए गुहार लगा रहे है। सैंकड़ों लोग जंतर-मंतर पर सपरिवार बैठे धरना दे रहे है। लेकिन हरियाणा सरकार के कान पर जूं नहीं रेंग रही है।  हरियाणा में दबंग जातियों का वर्जस्व लगातार बढ़ता जा रहा है। वे किसी भी रूप में अपनी पुरानी जमीन को खिसकते हुए नहीं देखना चाहती। दलितों पर अत्याचार तो हुड्डा सरकार के ...

'युवा’ बदलेंगे भारत का तस्वीर

Image
                                                                   'युवा’ शब्द सुनते ही चौड़ा सीना, फौलादी भुजाएं और आत्मविश्वास से लबालब भरा एक ऐसा शख्स सामने आता है, जो कुछ कर गुजरने की इच्छा रखता है। उसमें इतना जोश रहता है कि वह किसी भी चुनौती को स्वीकारने के लिये तैयार रहता है। चाहे वह कुर्बानी ही क्यों न हो। नौजवान अतीत का गौरव और भविष्य का कर्णधार होता है। देश की तरक्की में युवाओं का बहुत बड़ा हाथ होता है, यूं कहें तो युवावर्ग देश के भाग्य विधाता होते हैं। 16वां लोकसभा चुनाव भी इन युवाओं के इर्द-गिदã रहने वाला है। कोई भी राजनैतिक दल युवाओं को किसी भी कीमत पर छोड़ना नहीं चाहता। युवा मतदाताओं को लुभाने के लिए राजनैतिक दल हर संभव कोशिश में जूटे है। साथ ही युवा वर्ग भी इसबार चुनावों पर पैनी नजर रख्ो हुए है। वह न केवल वोट की कीमत को समझ रहा है। बल्कि सक्रिय राजनीति भी उतर रहा है। तीन वर्ष पहले समाजसेवी अन्ना हजारे...